प्रकृति ने सिंचा पहाड़ों में जीवन, इंसानों ने खींचा पहाड़ों से जीवन!

सुबह धूप की रोशनी में कुछ तो अलग था, जो मुझे अतिरिक्त खुशी दे रही थी। उस धूपमय वातावरण में वसंत का कोई गीत सुनाई दे रहा था। हम चार दोस्त एक साथ थे। जैसे प्रेम की भाषा शब्दों से परे होती है, वैसे ही हमारी आंखों में एक चमक थी और होठों पर एक अंतरंगी मुस्कान थी। वह दिन मंगलवार, 4 मार्च 2025 का था। हमने ऑनलाइन गाड़ी बुक की थी ताकि दो चीजें हो सकें- एक तो सबके पैसे कम खर्च हों, क्योंकि वह चार हिस्सों में बंट जाएगा, और दूसरा, जो उस दिन खुशी का सबसे बड़ा कारण था, कि हम भारतीय जन संचार संस्थान के 56वें दीक्षांत समारोह में शामिल होने जा रहे थे। हम सभी उत्साहित थे, क्योंकि हमें अपनी डिग्री मिलने वाली थी- मिजोरम की राजधानी आइजोल में अध्ययन के उन नौ महीनों का परिणाम, जहां हमने पहाड़ों के बीच रहकर न केवल किताबें पढ़ीं, बल्कि जीवन जीना भी सीखा। भारतीय जन संचार संस्थान, दिल्ली के मुख्य परिसर में हमारे मुख्य अतिथि रेल, सूचना एवं प्रसारण, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव जी आने वाले थे। नोएडा सेक्टर 62 से हम चार मित्र गाड़ी में बैठे और निकल पड़े।


हम सभी पहाड़ों पर चर्चा कर रहे थे कि मेरी एक मित्र, जो मुंबई से थी, के चेहरे पर प्रश्नवाचक चिह्न की रेखाएं उभर आईं। उसने गाड़ी से बाहर एक बहुत बड़ा-सा पहाड़ देखा और चौंककर बोली, ‘ये क्या पहाड़ है?’ इसके तुरंत बाद हम चारों दोस्तों की नजरें उस पहाड़ की ओर गईं, जहां विशाल पहाड़-जैसा दिखने वाले ढेर के ऊपर चील और गिद्ध जैसे शिकारी पक्षी मंडरा रहे थे। तभी गाड़ी चला रहे भैया बोले, ‘ये 'कचरे का पहाड़' है। जिस पहाड़ के बारे में आप बात कर रहे थे, उसे प्रकृति ने सींचकर तैयार किया है, और ये जो आप देख रहे हैं, इसे शहर के कचरे को खींचकर तैयार किया गया है।’ भैया आगे बोले, ‘ यदि गाड़ी की खिड़कियां खोल दें, तो गंध और बदबू से सिर में दर्द हो जाएगा।’ एक पहाड़, जिसे देखकर मन तरोताजा हो जाता है, लेकिन यह मानव-निर्मित कचरे का पहाड़ देखकर सुबह सुनाई दे रहा वह वसंत का गीत शांत हो गया।


मेरे मन में कई सवाल एक के बाद एक उठे, आखिर  कब तक पर्यावरण को इन्सान अपने फायदे के लिए दोहन करेगा?  साइंस जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 2050 तक दुनिया भर में प्लास्टिक का कचरा दोगुना हो सकता है। वहीं, विश्व बैंक की 'व्हाट ए वेस्ट 2.0' रिपोर्ट कहती है कि 2050 तक वैश्विक अपशिष्ट उत्पादन में 70% की वृद्धि होगी। मानव-निर्मित कचरे के पहाड़ से उत्पन्न होने वाली मीथेन गैस, कार्बन डाइऑक्साइड के बाद ग्लोबल वार्मिंग को नुकसान पहुंचाने वाली दूसरी सबसे बड़ी गैस है। आपको पता होना चाहिए कि प्राकृतिक प्रक्रियाओं से केवल 40 प्रतिशत मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है, जबकि 60 प्रतिशत मानवीय गतिविधियों से यह गैस उत्सर्जित होती है। ये आंकड़े हमें आकाशवाणी के रूप में चेतावनी दे रहे हैं और बार-बार कह रहे हैं कि अपने आप को देखो और इस व्यवहार को सुधारो।

यदि हम यही कचरे के पहाड़ बनाते रहे और नहीं सुधरे, तो जीवन में भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन नहीं सुन पाएंगे, यानी इस पृथ्वी के वसंत को महसूस नहीं कर पाएंगे। और हमें भगवान श्रीकृष्ण का वह रूप देखना पड़ेगा, जिसे शिशुपाल ने देखा था। वह अपनी गलतियों से बाज नहीं आया, तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। इसी प्रकार, यदि हम पृथ्वी को अपने नैतिक कर्तव्य के रूप में नहीं सुधारे, तो पृथ्वी भी हम सबका वध करने को मजबूर हो जाएगी।  ध्यान रहे, एक दिन हमारी आने वाली पीढियां हमें कोसेंगी कि हमने उनके रहने लायक इस ग्रह को नहीं छोड़ा।


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