पोस्टमॉर्टम, समाज और कुछ खोखली धारणाएँ!
Society Afraid of Postmortem? A Wake-Up Call for Rural India
हमारी पृथ्वी पर वायुमंडलीय दबाव की तरह ही हमारे समाज में कुछ खोखली धारणाएँ हैं, जिन्हें हम बिना सवाल किए ढोते आ रहे हैं। एक पिता अपने गाँव से दूर शहर में दिन-रात मेहनत करता है, ताकि उसके बच्चे अच्छा जीवन जी सकें। लेकिन एक दिन उसे फोन आता है कि उसकी बेटी अब नहीं रही। यह सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक जाती है। वह तुरंत गाँव लौटने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँचता है। इधर, गाँव वाले उसकी बेटी के शव को जल्दबाजी में शहर से गाँव ले जाते हैं, ताकि पुलिस उन्हें न पकड़े और पोस्टमॉर्टम न हो। उन्हें इस बात का बहुत डर है, हालाँकि मौत का कारण किसी को नहीं पता। कोई कहता है कि बेटी छत से गिरी, तो कोई इसे आत्महत्या बताता है।
शव गाँव पहुँचते ही लोग राहत महसूस करते हैं, मानो पोस्टमॉर्टम रोककर उन्होंने कोई बड़ा खतरा टाल लिया हो। पिता रेलवे की भीड़ से गुजरते हुए, आँखों में आँसू लिए घर पहुँचता है। एक रिश्तेदार उसे फोन करके कहता है, ‘इस मौत में बहुत संदेह है। कृपया पोस्टमॉर्टम करवाएँ, ताकि सच्चाई सामने आए।’ लेकिन पिता भावनाओं में बहकर कहता है, ‘मैं अपनी बेटी का शरीर चीर-फाड़ होते नहीं देख सकता।’ समाज भी पोस्टमॉर्टम के खिलाफ है। आखिर हम किस समाज में जी रहे हैं, जहाँ ऐसी खोखली धारणाएँ सच्चाई को दबा देती हैं? इनके कारण न जाने कितने हत्यारे बच गए होंगे, और हम समाज का झूठा पर्दा ढकते रहते हैं। लोग पुलिस, कानूनी प्रक्रिया, और सामाजिक आलोचना से डरते हैं, जिसके कारण वे सच्चाई को नजरअंदाज कर देते हैं।
बात साधारण है: प्राकृतिक मृत्यु में पोस्टमॉर्टम की जरूरत नहीं, लेकिन संदिग्ध मृत्यु में यह अनिवार्य है। समाज को जागरूक होना होगा, वरना न जाने कितनी बेटियों और बेटों की हत्या को प्राकृतिक मौत मान लिया गया होगा। गाँव वाले विकास के नाम पर व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर तमाम बातें करते हैं, लेकिन ऐसी मूलभूत और जरूरी बातों को नजरअंदाज कर देते हैं।
हाल ही में मेरठ में एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें दावा किया गया कि एक युवक को साँप ने दस बार डसा, जिससे उसकी मौत हो गई। युवक की पत्नी ने भी यही कहा। लेकिन पुलिस ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा, और रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि मौत साँप के जहर से नहीं, बल्कि गला घोंटने से हुई। जांच में पता चला कि पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर हत्या की और साँप की कहानी गढ़ी, यह सोचकर कि समाज की खोखली धारणाएँ उसे बचा लेंगी। लेकिन पोस्टमॉर्टम ने सच्चाई उजागर कर दी। समाज में पोस्टमॉर्टम को लेकर एक गलत धारणा है कि यह मृतक के शरीर के साथ अपमान है या भावनात्मक रूप से असहनीय है। यह धारणा कई बार अपराधों को छिपाने का कारण बनती है ।
समाज को जागरूक होना होगा। कुछ चीजें, जैसे पोस्टमॉर्टम और अंग दान, अक्सर पुरानी कहानियों या भावनाओं के कारण नजरअंदाज कर दी जाती हैं। लोग इन सबसे डरते हैं, क्योंकि उनके मन में गलत धारणाएँ हैं। ऐसी जागरूकता की सख्त जरूरत है। गाँवों और छोटे शहरों में पोस्टमॉर्टम, अंग दान, और कानूनी प्रक्रियाओं के बारे में जागरूकता फैलाने की जरूरत है। स्कूलों, पंचायतों, और सामुदायिक केंद्रों में कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिए।
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