लुप्त होता ‘वसंत ’, ‘पतझड़’ होता जीवन!
13 हजार वर्ग किलोमीटर से भी अधिक वन क्षेत्र अतिक्रमण के अधीन है, जो देश की राजधानी दिल्ली, सिक्किम और गोवा के कुल भौगोलिक क्षेत्र से भी अधिक है। यह जानकारी केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार है, जिसमें कहा गया है कि 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मार्च 2024 तक 13 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक वन भूमि पर अतिक्रमण हो चुका है। ये आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं। देश की राजधानी से भी अधिक क्षेत्रफल में वन क्षेत्र का अतिक्रमण के अधीन होना न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जानलेवा खतरे को भी आमंत्रित कर रहा है।
पर्यावरण जीवन का आधार है। यह हमें साँस लेने के लिए ऑक्सीजन प्रदान करता है और अनगिनत प्रजातियों को रहने के लिए आश्रय देता है। फिर भी, मानव द्वारा विकास के नाम पर पर्यावरण का हर तरह से दोहन लगातार बढ़ता जा रहा है। इसकी कीमत हर किसी को चुकानी पड़ेगी। एक जीता-जागता मामला हैदराबाद के कांचा गाचीबोवली के पास 400 एकड़ में फैले क्षेत्र का है, जहाँ कई तरह के जीवों का बसेरा है। उसे नष्ट करने की बात हो रही है।वे विकास के नाम पर विनाश कर रहे हैं। पर्यावरण के इस तरह लगातार दोहन से जलवायु असंतुलन, बाढ़, भूस्खलन और सूखे जैसी आपदाओं को हम न्योता दे रहे हैं। हाल ही में, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अप्रैल से जून के बीच सामान्य से अधिक गर्मी और लू चलने को लेकर अलर्ट जारी किया है। आपने भी महसूस किया होगा कि मौसम में अनियमित बारिश, अत्यधिक गर्मी और आजकल हमारे मौसमों का राजा कहलाने वाला ‘वसंत ऋतु’ लुप्त होता जा रहा है।
एक बात हमें हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि ये आंकड़े हमें चेतावनी दे रहे हैं। जिस तरह वसंत लुप्त हो रहा है, उसी तरह आने वाले समय में हमारा जीवन भी एक ‘पतझड़’ बनकर रह जाएगा। सबसे जरूरी बात यह है कि पर्यावरण प्रेम केवल रील्स तक सीमित न रहे या दो दिन पहाड़ों पर जाकर वीडियो बनाकर हैशटैग ‘प्रकृति प्रेमी’ लिखने से बेहतर है कि देश का हर व्यक्ति पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे।
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