झारखंड की विरासत को नए जीवन की जरूरत

दीवारों पर उकेरी गई कलाकृतियां महज सुन्दरता का प्रतिक भर नही है। यह दीवारें झारखंड की समृद्ध विरासत का प्रतिक है जिसे पदमा किला के नाम से लोग जानते हैं,इमारते किसी भी परंपरा और इतिहास का जीता जागता गवाह होती हैं ,यह अपने दौर के समाज और परिवेश सांस्कृतिक महत्व के साथ साथ ऐतिहासिकता का बोध भी करती हैं। सदियों पुरानी धरोहर आज भी गौरवशाली इतिहास और परंपरा की याद दिलाती हैं।सबके हिस्से की यादें और कहानियों को अपने अंदर समेटे ये खुबसूरत धरोहर रख रखाव के कमी के कारण दम तोड़ने लगी हैं।

झारखंड के हजारीबाग जिले से लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पदमा किला है,प्रत्येक दिन लोगो को अपने और आकर्षित करता रहता है ,हर उम्र के लोग इस खुबसुरत इमारत को देखने आते हैं ।राज किला परिसर काफी बड़ा है, यहां एक हवामहल और चारो तरफ से सीढियों से घिरा हुआ रानी तालाब भी स्थित है।

पदमा राजघरने की खूबसूरत धरोहर अब दम तोड़ती सूरत में दिखाई दे रही है। झारखंड की सरकार या राजघराने के मुखिया सौरभ नारायण सिंह को लुप्त हो रहे पदमा किला को बचाना चाहिए इसे संरक्षित करने की जरूरत है, अब धीरे धीरे दीवारे टूट रही है और खंडहर का रूप लेते जा रहा है।कुछ लोग शराब पीने का अड्डा बना दिए हैं, लोग दरवाजे , खिड़कियों को भी तोड़ दिए हैं, दीवारों पर गालियां लिखी हुई है,कुछ आशिक जो सामने से प्रेम का इजहार नही कर पाए वो इन दीवारों अपनी प्रेमिका का नाम लिखे हैं।

अभी कुछ दिन पहले मैं सिक्किम गया था सिक्किम में एक वाटरफॉल में घूमने के लिए गया अंदर जाने के 50 से लेकर 200 रूपये तक का टिकट था।वाटरफॉल वाले पार्क के अंदर प्रवेश किया देखा की बहुत सुंदर तरीके से एक पानी के झरने पर्यटक स्थल के रूप में तैयार किया गया है,इससे आस पास के लोगो को रोजगार भी मिलता है वहां छोटे बड़े कई दुकान खोल हुए थें। इससे झारखंड के पर्यटक विभाग को प्रेरणा लेना चाहिए और झारखंड में विलुप्त हो रहे कीमती धरोहर को बचाने का प्रयास करना चाहिए।

पदमा किला का इतिहास

पदमा किला की इतिहास के पन्ने की शुरुआत रामगढ़ से हुई है,चुंकि राजा बागदेव सिंह, रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह के पूर्वज और उनके भाई सिंह देव ने 1366 में रामगढ़ राज की नींव रखी थी। बाद में इन्होंने बड़कागांव और इचाक होते हुए पदमा में आ बसे ,राजा वासुदेव सिंह और सिंह देव ने 1366 से 1403 तक राज किया। इसके बाद बागदेव सिंह, कराटे सिंह, राम सिंह, माधव सिंह, जुगत सिंह, हरमीत सिंह, दलित सिंह, विष्णु सिंह, मुकुंद सिंह, तेज सिंह और पटेरा नाथ सिंह समेत कई राजाओं ने अपने पुश्तैनी राजसी साम्राज्य की देखभाल की। राज बहादुर कामाख्या नारायण सिंह इस राजवंश के अंतिम राजा थे। उनके कार्यकाल में ही हमारा देश स्वतंत्र हुआ। जब देश आजाद हुआ, तो पूरा छोटानागपुर क्षेत्र राजा कामाख्या नारायण सिंह के अधीन था। 1970 तक वे राजघराने के मुखिया रहे। इसके बाद राजा इंद्र जितेन्द्र ने राजपरिवार की कमान संभाली, जो तत्कालीन विधायक सौरभ नारायण सिंह के पिता थे। 




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