होली: जीवन में नए रंग भरती है
होली सुनते ही मन में उमंग और उत्साह की लहरें दौड़ने लगती है और मन प्रसन्न हो जाता है ,एक अलग दृश्य हमारे मन में नाम सुनते ही बनाने लगता है,जो काफी खुबसूरत होता,यह खुबसूरत दृश्य करोड़ों भारतीयों के मन में अरबों प्रकार के तस्वीरें बनाते हैं,यह रंगों का त्योहार है,जिसे बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत, वसंत का आगमन का प्रतीक है। इस साल 25 मार्च को होली मनाया गया।
होली की शुरुआत
पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप
नामक एक राजा जो अपने प्रजा को कहता था की तुम सब मेरी पूजा अर्चना करो। उस
राज्यतंत्र में वहां के लोगों पर अपनी विचार थोपता और समाज को नुकसान पहुंचता था।
हिरण्यकश्यप का एक पुत्र था जिसका नाम प्रह्लाद था, जो भगवान विष्णु का परम भक्त
था। राजा को यह पसंद नहीं था क्योंकि,वह चाहता था कि प्रह्लाद भगवान विष्णु में
अपनी आस्था छोड़ दे और उनकी पूजा करना बंद कर दे। जब प्रह्लाद ने ऐसा करने से
इनकार कर दिया, तो हिरण्यकश्यप ने उसे कई बार
मारने की कोशिश की।
हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को एक
दिव्य वरदान प्राप्त था कि वह आग से नहीं जलेगी। राजा ने प्रह्लाद को मारने के लिए
होलिका की गोद में बैठाया और दोनों को आग लगा दी। भगवान विष्णु के आशीर्वाद से,
प्रह्लाद, जो उनका नाम जपता रहा और बच
गया, लेकिन होलिका उसी आग में जल गई। इसीलिए होली के एक दिन पहले होलिका दहन किया
जाता है। जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। होली भगवान कृष्ण और राधा के
बीच दिव्य प्रेम का उत्सव भी है। इसलिए, मथुरा और वृंदावन में एक विस्तृत होली
खेली जाती है।
फूलों से बना हुआ गुलाल अबीर और रंग लोग एक
दूसरे को लगते थे। गुलाल लगते ही एक अलग सकारात्मक ऊर्जा महसूस होता और कई
बिमारियों से बचाता भी था ,लेकिन आज कल मिलावटी रंग लोग लगते हैं जो शरीर को
नुकसान भी पहुंचता है।
मझगांव की होली आज से लगभग 29 साल
पहले जब होता था तो सबको गांव के तरफ खींच लाता था,बड़े बुजुर्ग, युवा और जो
व्यक्ति गांव से बाहर किसी शहर में बस गया हो पूरे साल गांव में नजर नहीं
आता,लेकिन होली के माह में वो गांव में ही दिखेंगे। भीखू सिंह जी, जो गांव के शिक्षा
क्षेत्र में निस्वार्थ भाव से योगदान देते आएं हैं, उनके दरवाजे पर होली आने के
लगभग एक महीने पहले से ही होली के लोकगीत लोग गाते, साल भर में यदि किसी के साथ
मनमुटाव या किसी तरह के लड़ाई हुई हो,वो होली के इस महीने में सब कुछ भूल जाते
हैं,और नए सिरे से प्रेम के साथ रहने लगते। होली के एक दिन पहले होलिका दहन किया
जाता है और उसी दिन में खाने कई तरह व्यंजन पकाए जाते हैं जैसे धूसका, पुआ,दही
वड़ा , नमीकन इत्यादि बनाएं जाते हैं। उस समय पूरा गांव वासी भीखु सिंह के दरवाजे
पर होली के गीत और ढोलक के धुन में मगन रहते हैं।दरवाजा घर से जुड़ा हुआ है, उसे
साधारण भाषा में एक चौपाल कह सकते हैं जो पेड़ से नही सट्टा हुआ हो बल्कि घर के एक
हिस्से में बड़ा सा खाली स्थान जहा सब कोई बैठ जाए । उस चौपाल से सभी लोग ढोलक
बजाते,गाना गाते हुए गांव के मंदिर के पास एक खाली स्थान में लकड़ी जमा करते हैं और उस स्थान पर जमा किए हुए लकड़ी में
आग लगा दी जाती है ,जलते हुए लकड़ी के सामने पूरे गांव के लोग मौजूद होते हैं।
अगर किसी के घर में देहांत हो गया हो
तो पूरे साल उस व्यक्ति के घर कोई भी शुभ कार्य जैसे शादी,छठ पूजा आदि नहीं करते
हैं,लेकिन होलिका दहन के बाद नए सिरे से सबकुछ शुरू होता है।
होली के दिन चौपाल वाले दरवाजे पर सभी
लोग संगीत कार्यक्रम में शामिल होते हैं ,
लड़ाई,गुस्सा,बदले की भावना,मन मुटवा आदि सारे बातों को भूलते हुए एक दूसरे
को गुलाल लगते हैं। बच्चे अपने से बड़ों को पैर में गुलाल लगते हैं और आशीर्वाद
प्राप्त करते हैं। बराबर के उम्र वाले एक दूसरे के गालों पर गुलाल अबीर लगते हैं।
अभी जो वर्तमान स्थिति में सबकुछ
बदलता जा रहा है अब होली मझगांव में ढोलक के वो धुन कम सुनाई देने लग गाया है ।अब
युवा पीढ़ी डीजे के धुन पर नाचते हुए होली मानते हैं। होली की त्योहार शुरु से ही
प्रेम , उत्साह और लोगो को एक बंधन में स्नेह के साथ रहने के लिए जाना जाता है।
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