लद्दाख आमरण अनशन के जरिए अपनी आवाज बुलंद कर रहा है

लद्दाख वासी अपने हिस्से में पूर्ण राज्य और संविधान की छठी अनुसूची लागू करने की मांग की अगुवाई कर रहे जलवायु कार्यकर्ता और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक की लद्दाख में 21 दिवसीय भूख हड़ताल और आमरण अनशन जारी है जो 6 मार्च को शुरू हुआ था, और आज 23मार्च 2024 को 18वां दिन है।

केंद्र सरकार से बातचीत के ये दौरे 19 से लेकर 23फ़रवरी 2024तक चला  उसके बाद फिर से 4 मार्च 2024 तक चला और कोई निष्कर्ष नहीं निकला। जिसके बाद 6 मार्च को नवांग दोरजे मेमोरियल से अनशन का आह्वान कर सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे हैं।

कहनी शुरू हुआ अगस्त 2019 में, भारत की संसद ने जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 पारित किया जिसके द्वारा 31 अक्टूबर 2019 को लद्दाख एक केन्द्र शासित प्रदेश बन गया। सबको उम्मीद थी कि लद्दाख को विधानमंडल भी दिया जाएगा और छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा भी दी जाएगी।

 चुनावी घोषणापत्र में साल 2019में बीजेपी ने लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने का वादा किया था।

विडियो संदेश के माध्यम से आज  वांगचुक ने कहा  मैं पानी और नमक पर जलवायु उपवास के अपने 18वें दिन की शुरुआत कर रहा हूँ। रात बहुत साफ रही है और इसलिए तापमान शून्य से 8 डिग्री नीचे चला गया है। सब कुछ इस तरह जम गया है और इन परिस्थितियों में मेरे साथ लगभग 150 लोग खुले में सोए, ताकि भारत सरकार को लद्दाख और उसके पहाड़ों और उसकी स्वदेशी संस्कृतियों की रक्षा करने के उनके वादों की याद दिला सकूँ। भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत, जो स्वायत्तता और स्वायत्त परिषद प्रदान करती है, जहाँ स्वदेशी लोगों का निर्वाचित निकाय तय करता है कि इन पहाड़ों का प्रबंधन कैसे किया जाए, किस तरह के विकास और उद्योगों को अनुमति दी जाए और क्या नहीं। इसके बिना, हमारे पास कोई अधिकार नहीं है और नौकरशाही तय करती है कि क्या लाया जाए। खैर, विकास के नाम पर हम पहाड़ों को लूटते हैं और अपने स्वयं के आवास, ग्लेशियरों, वनस्पतियों और जीवों को नष्ट करते हैं जो यहाँ मौजूद हैं, जबकि हम आठ प्रतिशत दस प्रतिशत विकास को एक राष्ट्र के लिए सबसे अच्छी बात के रूप में बात करते हैं, हमें यह देखना चाहिए कि हम इस सुंदर ग्रह के अकेले निवासी नहीं हैं। हमारे और भी भाई-बहन हैं, जो जंगली हैं। और आइए देखें कि उनके साथ क्या हो रहा है जबकि हम 8 और 10% विकास की बात करते हैं।  हम इस ग्रह पर अकेले नहीं हैं। विकास इतना मानव-केंद्रित नहीं हो सकता। WWF के अनुसार, इस ग्रह से 69% वन्यजीवों का सफाया हो चुका है। पिछले 50 वर्षों में ही, 83% जलीय जीवन का सफाया हो चुका है और जिन जंगलों पर हम बहुत अधिक निर्भर हैं, उनमें से 30% जंगल मिट चुके हैं और हम विकास की बात करते हैं आठ प्रतिशत दस प्रतिशत उनका अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है और यह सिर्फ़ उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाता है, हम इस ग्रह पर उन पर निर्भर हैं।

  पर्यावरण की रक्षा बेहद जरूरी है सरकार को तमाम लोगों के साथ बैठक कर जो पर्यावरण विषय में गहन जानकारी रखते हैं और कई तरह की रिपोर्ट की आधार पर कीमती चीजों का संरक्षण करना चाहिए।

छठी अनुसूची से जुड़ी समस्याएँ:

छठी अनुसूची गैर-आदिवासी निवासियों के खिलाफ विभिन्न तरीकों से भेदभाव करती है और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी करती है।कानून के समक्ष समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14), भेदभाव के खिलाफ अधिकार (अनुच्छेद 15), तथा भारत में कहीं भी बसने का अधिकार (अनुच्छेद 19) इन सभी अनुच्छेद की गारंटी के अधिकार का उपहास माना जाता है।

भारत की खुबसूरती यहां के हर गांव, शहर के  कण कण में हैं। सरकार और लद्दाख के लोग सही संवाद स्थापित करेंगे और कल्याणकारी निर्याण लेंगे।

 

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