किसानों की योजना सबको पसंद है
देश के अन्नदाता जो अपनी पुरी जीवन देशवासियों समेत कई तरह के जीव जंतु के हिस्से में अन्न प्रदान करने में लगा देते हैं।
हम सब बचपन से पढ़ते सुनते आएं हैं की भारत किसानों का देश है , भारत एक कृषि प्रधान देश है, कोई नेता जब भाषण देता है तो किसानों की भलाई की बात करता है और आज़ादी से लेकर के आज तक बस बातें ही किया गया है, इसके लिए कोई एक पार्टी या सरकारी विभाग दोषी नहीं है ये सामूहिक अपराध है इसमें सब दोषी हैं जिन्होंने कृषि और किसानों की बात करके भ्रष्टाचार कर खुद का पेट भरा है। फिल्मों और कहानियों में किसानों को सबसे खुशहाल किसानों के रूप में दिखाया जाता हैं जब हम और आप फिल्में में देखते हैं वहां लह लहते हुए हरे- हरे खेत-खलिहान, शानदार जीवनशैली ,बड़े-बड़े ट्रैक्टर्स ये सबकुछ उस किसान के हिस्से में होता है लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफ़ी अलग है । किसानों के हिस्से में अभी तक जो एनसीआरबी अकांडे के आए है वो सिर्फ उनके मौत और आत्महत्या में बढ़ोतरी की हैं, उनके जीवान में विकास की बढ़ोतरी के आंकड़े कहीं नजर नहीं आती हैं।
2011 के ग्रामीण-शहरी वितरण के अनंतिम जनसंख्या योग के अनुसार, देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जो यह संख्या है इनमे से कुछ के पास ज़मीन नहीं है जिनके पास ज़मीन है उनके पास बुनियादी सुविधाएं नहीं है, निस्सदेह इस देश में थोड़ा बहुत ज़मीन सबके हिस्से में है लेकीन कृषि के लिए सबसे जरूरी पानी है, जो किसानों के हिस्से कभी नही आता है और खासकर ग्रामीण इलाकों को सबसे अधिक पानी की दिक्कत का सामना करना पड़ता है यानी सुखा इस देश की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। एक किसान और उसके परिवार जब अपने हिस्से का पूरा मेहनत कर खेती करता है और बुनियादी सुविधाओं की कमी या मौसम के ख़राब प्रभाव के कारण फसल खराब हो जाता या पैदा नही हो नही हो पाता है तो किसान अपने पेट भरने के लिए मजदूरी करने को मजबूर हो जाता है और अपने गांव से दूर किसी शहर में अपना खून पसीना बहा रहें होते है बाकी जो किसान कर्ज़ ले कर खेती करते है उन्हें किसानी को छोड़ कर सभी प्रकार के मजदूरी करना पड़ता है, कर्ज़ के लिए पैसे नहीं जामा कर पाते हैं और अंतिम पड़ाव पर आत्महत्या करते हैं।
एनसीआरबी जो हर साल आंकड़े जारी करती है,वो जो देश के हर कोने में मौजूद पुलिस के एफआईआर में दर्ज होता है उसी के अनुसर आंकड़े तैयार करती हैं, बाकी जो मौते दर्ज नहीं हो पाती उसका क्या? 2021 में हर 2 घंटे में एक खेतिहर मज़दूर ने आत्महत्या की। 2021 में भारत में कुल 1,064,033 लोगों ने आत्महत्या की। यह संख्या 5,563 है, जो 2020 से 9% और 2019 से 29% की वृद्धि है। सबसे ज़्यादा संख्या महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में दर्ज की गई। किसी भी कृषि परिवार में आय के तीन स्रोत खेती, पशुधन और दैनिक मज़दूरी हैं। खेती से किसान की घरेलू आय 2013 में 48% से घटकर 2021 में 38% हो गई। दैनिक मज़दूरी घरेलू आय में सबसे बड़ा योगदानकर्ता है। यह इन परिवारों की अर्थव्यवस्था में एक बुनियादी बदलाव है। खेतिहर मज़दूरों के अलावा, 5,318 किसानों ने भी आत्महत्या की, जिससे कृषि क्षेत्र में आत्महत्या से मरने वालों की कुल संख्या 10,881 हो गई,
देश में जलवायु परिवर्तन किसानों और पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। हर तरह के प्रदूषण जैसे जल ,वायु , मिट्टी प्रदूषण आदि शामिल हैं। सरकार और निजी कंपनियां अपने हिस्से के लाभ के लिए प्रदुषण जैसी समस्याओं से होने वाली नुकसान को नजरंदाज करती हैं। आजकल बेमौसम बारिश और गर्मी के कारण फसल की पैदावार कम हो रही है।
किसानों की आत्माहत्या के दोषी किसे ठहराया जाया ?
पहली बात जिसे बुनियादी सुविधाएं चाहिए उसे जल्दी मिलती नही क्योंकि वे कमजोर हैं,और उनके पास घुस देने के पैसे नहीं हैं। किसानों के नाम पर अक्सर सरकार योजना लाती है,क्योंकि हमरा संविधान सबको एक तराजू में रखता है,लेकिन सरकारी योजना की बात करे तो हमारे गांव में ही देख लीजिए मझगांव में जिसके पास मिट्टी का घर है उसको जल्दी सरकारी योजना के तहत घर नही मिलता है,अगर मिलेगा तो उसको वहां के सरपंच,पंचायत सचिव या वर्ड के सदस्य को पैसा देना होता है वो भी 20हजार से 30हजार तक आप इनमे से किसी एक घुस दे दें वो वापस में बांट लेते हैं ,इतना ईमानदारी तो है उनके पास की घुस के पैसे बराबरी में बांटें। आप पैसे (घुस) देने में सक्षम नहीं हैं तो आपको मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा और जो सुविधा मिलने वाला होगा वो कभी नही मिलेगा क्योंकि यहां सब के सब सरकारी सुवधाओं को बेचने पर लगे हैं,जो खुद को सरपंच या बहुत बड़ा सरकारी विभाग का नेता कहता हो सबके सब दोषी हैं।
हकीकत कहिए या कहनी थोड़ा पुराना है लेकिन लोगो के फितरत आज भी वही है। अगस्त 1995 में उड़ीसा में एक सुखा विरोधी परियोजना का उद्घाटन किया गया। इसमें कालाहांडी, बोलगीर और कोरापुट सहित कुछ जिलों पर छह वर्षों में 4,557 करोड़ रूपये (प्रति वर्ष 750 करोड़ रूपये से अधिक) खर्च करना शामिल था ।अगर इस पैसे का सही इस्तेमाल बुनियादी ढांचा को मजबूत करने के लिया किया जाता तो यह सार्थक होता हालांकि ऐसा हुआ नहीं ये रकम भ्रष्टाचार का भेंट चढ़ गया और इसी बीच दूसरा रूप देखे तो किसी ना किसी किसान ने आत्महत्या किया होगा और उसके घर मौत का मातम पसरा होगा ।
मौत सबके हिस्से का एक सच्चाई है। जो वास्तव में दबाव महसूस करते हैं वो किसान वर्ग है पानी अमीरों और तकतवारों के कब्जे में हैं। समय बदल रहा है, ईमानदारी आज भी है और बहुत ताकतवर है,ये मौत से नहीं डरते हैं।
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