चुनावी चंदे से राजनीतिक पार्टियों का विकास,लोग पानी के लिए हर दिन कर रहे संघर्ष
किसी भी क्षेत्र में विकास को मापना है तो मूलभूत सुविधाएं देखते हैं सड़क,बिजली,सही पोषण और पानी लेकिन गर्मियां आते ही राजस्थान के कुछ सबसे शुष्क इलाकों में ग्रामीणों ने भूजल की तलाश शुरू कर दी है।
इस
रेगिस्तानी राज्य का केवल 10 प्रतिशत भाग ही जल संसाधनों में वर्गीकृत किया जा
सकता है। बाकी 90 फीसदी पीने और सिंचाई के
लिए भूजल पर निर्भर है। 14 मार्च 2024 को
भारत निर्वाचन आयोग ने एसबीआई
द्वार दिए चुनावी चंदे के आंकड़े सार्वजनिक किया
जिसमे राजनीति पार्टियों ने हजारों करोड़ रूपए अपने हिस्से में इस्तेमाल
किया है l future gaming कम्पनी
पर 2022 में ईडी ने हमला बोला था लेकिन इस कम्पनी ने 1368 करोड़ की बॉन्ड्स खरीदी
है ये साफ जाहिर होता है उद्योगपती अपने हिस्से के फायदे के लिए राजनितिक
स्वार्थ में आम लोगों को अक्सर रौंदती है।
हर साल कोई न कोई रिर्पोट या रिसर्च से पता चलता
है कि राजस्थान में भूजल स्तर प्रति वर्ष 1 मीटर गिर रहा है। अध्ययनों से पता चलता है कि भूजल के स्रोतों के
रूप में पहचाने गए 302 क्षेत्रों में से कम से कम 219 क्षेत्रों का अत्यधिक दोहन
किया गया है। लेकीन सरकार रिपर्ट्स में मौजूद आंकड़ों को नजरअंदाज कर देती है ।
दक्षिण
राजस्थान के सांचौर शहर से साठ किलोमीटर आगे, सैकड़ों निवासियों ने पानी के लिए
खुदाई शुरू कर दी है। ताकि वो पानी पी सके । खुदाई वाला पानी है बहुत खारा होता है, वहां के लोगों ने शिकायत की लेकिन किसी ने मदद नहीं की सरकारी
काम बस फोटो गैलरी में जोड़ने के लिए किया जाता है इसी वजह से कभी किसी की मदद
भी हो जाती है।
भारत में सांचौर की तरह बहुत सारे गांव वा शहर
हैं जैसे चितलवाना तहसील के कम से कम एक दर्जन गांव भीषण पेयजल संकट से जूझ रहे
हैं। इस क्षेत्र में 2008 में नर्मदा नहर
आई थी। यह क्षेत्र के 500 गांवों और जालौर तथा सांचौर को पीने का पानी उपलब्ध
कराती है, लेकिन इस तहसील को नजरअंदाज कर दिया गया है, जहां के अधिकांश निवासी
मजदूरी करते हैं।
चूँकि जल
स्तर खारा है, पीने योग्य पानी प्राप्त करने का एकमात्र तरीका गड्ढे खोदना
है। पानी पीना है तो ग्रामीणों को हर दो
या तीन दिन में नये सिरे से गड्ढा खोदना होता है ।
पूर्वी राजस्थान में भरतपुर के बयाना के
पटपरीपुरा गांव में पानी का एक भी स्रोत नहीं है।
एक कुआं तो है, लेकिन पानी पीने लायक नहीं है। ग्रामीण दूसरे गांव से पानी
लाने के लिए 3 किमी पैदल चलकर उत्तर प्रदेश की सीमा पर जाते हैं।
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